क्या है सेक्शन 230, जिसे टि्वटर पर डोनाल्ड ट्रंप को बैन करने के लिए गया इस्तेमाल? जानें

अमेरिका में पिछले हफ्ते कैपिटल बिल्डिंग (संसद भवन) पर ट्रंप समर्थकों के हमले के बाद कई बड़ी सोशल मीडिया कंपनियां अमेरिकी राष्ट्रपति के निजी अकाउंट्स को या तो स्थाई या अस्थाई रूप से बंद कर चुकी हैं। ट्विटर ने तो हिंसा और गलत जानकारी फैलाने के लिए ट्रंप के साथ-साथ उनके कुछ करीबियों के हैंडल हमेशा के लिए बंद करने का फैसला किया। हालांकि, उसके इस कदम ने एक बार फिर अमेरिका में सेक्शन 230 पर बहस को जन्म दे दिया है। यूएस कम्युनिकेशन डिसेंसी ऐक्ट की इस धारा के जरिए अमेरिका की बड़ी टेक कंपनियां अपनी ताकत का इस्तेमाल कर सकती हैं। हालांकि, इसका प्रयोग सीधे राष्ट्रपति के खिलाफ करना चौंकाने वाला कदम है।

क्या है सेक्शन 230?: कम्युनिकेशन डिसेंसी ऐक्ट का सेक्शन 230 पहली बार 1996 में पास किया गया था। इसके तहत इंटरनेट कंपनियों को अपनी वेबसाइट पर शेयर किए गए डेटा से कानूनी सुरक्षा मिलती है। पहले इस धारा को ऑनलाइन पोर्नोग्राफी को रेगुलेट करने के लिए लाया गया था। सेक्शन 230 उस कानून का संशोधन है, जो कि यूजर्स को उनके ऑनलाइन कमेंट्स और पोस्ट्स के लिए जिम्मेदार बनाता है।

इस सेक्शन के तहत कोई भी सोशल मीडिया कंपनी अपनी वेबसाइट पर यूजर द्वारा पोस्ट की हुई चीजों की जिम्मेदार नहीं होगी। अगर यूजर वेबसाइट पर कोई भी अवैध या गलत चीज पोस्ट करता है, तो सोशल मीडिया कंपनी पर केस नहीं हो सकता। इतना ही नहीं प्राइवेट कंपनियों को अधिकार है कि वे अपनी गाइडलाइंस का उल्लंघन करने वाले लोगों को प्लेटफॉर्म से ही हटा सकते हैं। इसलिए सेक्शन 230 के तहत सोशल मीडिया कंपनियां ट्रंप के अकाउंट को बंद करने के फैसले पर पूरा अधिकार रखती हैं।

कब तैयार हुआ था सेक्शन 230: इस कानून को सबसे पहले ओरेगॉन के डेमोक्रेट सांसद रॉन वाइडेन और साउथ कैरोलाइना से रिपब्लिकन सांसद क्रिस कॉक्स ने दो दशक पहले ड्राफ्ट किया था। तब इसका मकसद अमेरिकी संविधान के पहले संशोधन के तहत बड़ी टेक कंपनियों को बढ़ावा देना और अभिव्यक्ति की आजादी को सुरक्षा देना था।

आलोचना का शिकार भी होता रहा है सेक्शन 230: जहां एक तरफ सेक्शन 230 सोशल मीडिया कंपनियों के लिए काफी अहम साबित होता है, वहीं इसके आलोचकों का कहना है कि यह कानून फेसबुक-ट्विटर के उनके मौजूदा स्वरूप से काफी पहले तैयार हुआ था। राजनीतिक नेता और इंटरनेट एक्टिविस्ट लगातार इस कानून में संशोधन की मांग करते रहे हैं। कई आलोचकों का कहना है कि इस कानून से बड़ी टेक कंपनियां राजनीतिक दलीय गतिविधियों में भागीदार बन सकती हैं। गौरतलब है कि ट्रंप से लेकर अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडेन भी इस तरह के रेगुलेशन को बदलने की बात कह चुके हैं।

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