चौपाल: निजता पर जोखिम

चौपाल: निजता पर जोखिम

वाट्सऐप ने अब अपने उपयोगकर्ताओं के सामने सिर्फ दो ही विकल्प छोड़े हैं- या तो वे उसकी शर्तें मान कर अपनी निजता को खत्म करें या फिर अपना अकाउंट खत्म कर लें। शर्तें मानना है या नहीं, इस बारे में सोचने के लिए कंपनी ने आठ फरवरी तक का वक्त दिया है। हालांकि अब वाट्सऐप की ओर से यह सफाई आई है कि वह अपने उपयोगकर्ताओं के हित और उनकी निजता सुरक्षित रखेगा। लेकिन खुद उसकी ओर से ही जारी कुछ बातों के बाद लोगों में जो आशंका बन गई है, उसका समाधान एक आश्वासन के जरिए इतना आसान नहीं है।

गौरतलब है कि दुनियाभर में दो सौ करोड़ से ज्यादा लोग वाट्सऐप इस्तेमाल करते हैं। नया साल शुरू होते ही उपयोगकर्ता को वाट्सऐप पर नई शर्तों और निजता नीतियों के बारे में सूचना मिलने लगी। इसमें लिखा है कि इसके उपयोगकर्ताओंं को यह नीति माननी होगी। इसमें मूल बात यह है कि वाट्सऐप पर लोग जो सामग्री भेजते हैं या हासिल करते हैं, कंपनी उन्हें कहीं भी अपनी तरह से उपयोग कर सकती है।

हालांकि घोषित तौर पर यह नहीं कहा जाता है, लेकिन ऐसे उदाहरण सामने आए हैं। जाहिर है, नई नीति के जरिए वाट्सऐप अपने दो सौ करोड़ से ज्यादा उपयोगकर्ताओंं के तमाम ब्योरों तक पहुंच हासिल कर लेगी। हो सकता है कि वह उन ब्योरों को दूसरे मंचों पर साझा भी करे। कहा गया कि इसे मानना है तो ठीक, वरना हमारे मंच से बाहर हो जाओ। क्या यह एक तरह का विश्वासघात नहीं है?
’मधु कुमारी, बोकारो, झारखंड

खतरे के बीच

देश के सात से अधिक राज्यों में बर्ड फ्लू के कारण हजारों पक्षियों का मरना या मारा जाना दुखद तो है ही, मानवता पर प्रश्नचिह्न भी है। बेजुबान पक्षियों में कौवों की बड़ी संख्या में मौत झकझोर रही है। कौवों की चिंता इसलिए भी ज्यादा है कि पहले से ही शहरों में इनकी संख्या बहुत घट चुकी है, गांवों में भी वे पहले की तरह नजर नहीं आते हैं। ऐसे में उनकी मौत बाकी बचे हुए कौवों को मानव बस्तियों से दूर कर देगी।

कौवों के साथ मानव बस्तियों का रिश्ता पुराना है। वे सदियों से सफाईकर्ता के रूप में हमारे आसपास से नाना प्रकार के जहरीले या अवांछित कीड़े-मकोड़ों को हटाते रहे हैं। उनका हमारे पास न होना हमारे सेहत के लिए भी खतरनाक है। कौवों की मौत की खबरें राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, केरल, हिमाचल प्रदेश दिल्ली हरियाणा और उत्तर प्रदेश से विशेष रूप से आ रही है। विशेषज्ञ जांच में लगे हैं, लेकिन सामान्य रूप से कौवों में बर्ड फ्लू का संक्रमण दूसरे पक्षियों से ही हुआ होगा।

आमतौर पर कौवों को दूसरे पक्षियों, जंतुओं के शव खाते देखा जाता है। इसी वजह से उनमें संक्रमण की गुंजाइश ज्यादा रहती है। इस बार ज्यादा आशंका यह है कि विदेशी पक्षियों के जरिए बर्ड फ्लू का देश में संक्रमण हुआ है। सर्दियों में बड़ी संख्या में विदेशी पक्षी भारत के ताल, तालाबों व खेतों में समय बिताने आते हैं।

कुछ पक्षी तो यहां सर्दियों के समय चार-पांच महीने तक रहते हैं। ऐसे में यह बहुत जरूरी है कि विदेशी पक्षियों की खास निगरानी की जाए। ताल-तालाबों के आसपास नजर रखने के साथ ही साफ-सफाई के काम को मुस्तैदी से अंजाम देना होगा। कौवों में कुछ प्रजातियां विरल हो चली हैं। बर्ड फ्लू के बहाने ही सही, उनके लिए संवेदना बढ़े, तो हम मनुष्यों का ही भला होगा।
’अरविंद पाराशर, फतेहपुर, उप्र

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